बृजेश अमोलिया, सिटीजन जर्नलिस्ट, हरनियाखेड़ी (महू)
बढ़ती गर्मी और लगातार घटते हरित क्षेत्र के बीच महू के पक्षी अब जंगलों के सहारे नहीं, बल्कि आम नागरिकों की संवेदनशीलता के सहारे जीवित हैं। यहाँ पानी से भरा एक साधारण सकोरा अब केवल मिट्टी का बर्तन नहीं रहा, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के सहअस्तित्व का प्रतीक बन चुका है।
महू और आसपास के मालवा क्षेत्र में एक सिटीजन जर्नलिस्ट के रूप में काम करते हुए मैंने देखा है कि जलवायु परिवर्तन किस तरह इस क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन को धीरे-धीरे बदल रहा है। बढ़ता तापमान, भीषण गर्मी, जल संकट और तेज़ी से हो रहा शहरीकरण न केवल मानव जीवन, बल्कि क्षेत्र की वनस्पतियों और जीव-जंतुओं को भी प्रभावित कर रहा है।
महू के कोतवाली चौकी क्षेत्र में सकोरा वितरण
नीम, पीपल, बरगद, पलाश और बबूल जैसे पारंपरिक वृक्ष निर्माण गतिविधियों और भूजल क्षरण के कारण धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। वहीं गौरैया, फाख्ता, तोता, बटेर, लंगूर और सियार जैसे जीव भी अपने सिकुड़ते प्राकृतिक आवासों में जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
शहरी पक्षी सबसे अधिक प्रभावित हैं, क्योंकि अत्यधिक मौसम की परिस्थितियों में वे पानी और आश्रय के लिए काफी हद तक मानव बस्तियों पर निर्भर रहते हैं। इसी बढ़ती पर्यावरणीय चिंता के बीच महू नगर और आसपास के हरनिया खेड़ी, गुजरखेड़ा, किशनगंज, कोतवाली चौक और लुनियापुरा जैसे क्षेत्रों में सकोरा वितरण का सामुदायिक अभियान शुरू हुआ है। ‘सकोरा’ शब्द कई लोगों के लिए भावनात्मक महत्व रखता है, लेकिन व्यवहारिक रूप में यह प्यासे पक्षियों के लिए पानी से भरा मिट्टी का एक साधारण पात्र है। हर वर्ष रेडाउंड फाउंडेशन अपने पर्यावरण जागरूकता अभियान के तहत ऐसे सैकड़ों सकोरों का वितरण करता है। साथी नागरिकों और स्वयंसेवकों के साथ मैंने भी इस पहल में भाग लिया है और अभियान को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी निभाई है।
स्थानीय निवासियों, समाजसेवियों और संस्था के सदस्यों के सहयोग से हर साल लगभग 2,000 से 3,000 सकोरे — और कई बार इससे भी अधिक — वितरित किए जाते हैं। हालांकि इस अभियान का उद्देश्य केवल निःशुल्क वितरण तक सीमित नहीं है। इसका बड़ा लक्ष्य शहरी क्षेत्रों में पक्षियों और जीव-जंतुओं की घटती संख्या के प्रति लोगों को जागरूक करना है। अभियान से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि ऐसे प्रयासों की उपेक्षा की गई, तो आने वाली पीढ़ियाँ शायद गौरैया और अन्य स्थानीय पक्षियों की परिचित चहचहाहट सुनने से भी वंचित रह जाएँगी। जहाँ वन्य पक्षी प्राकृतिक परिवेश में कुछ संसाधन खोज लेते हैं, वहीं शहरी पक्षियों का अस्तित्व आम नागरिकों की संवेदनशीलता पर निर्भर हो गया है। जो कठोर जलवायु परिस्थितियाँ इंसानों को परेशान करती हैं, वे इन छोटे जीवों को कहीं अधिक गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं। चूँकि पक्षी अपनी पीड़ा शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते, इसलिए यह अभियान छोटे लेकिन सार्थक प्रयासों के जरिये करुणा और सहानुभूति को बढ़ावा देने की कोशिश करता है।
यह पहल इस विचार को भी मजबूत करती है कि अधिकारों के साथ-साथ नागरिकों को प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ भी निभानी चाहिए। जिन परिवारों को सकोरे दिए जाते हैं, उन्हें हर गर्मी में यह परंपरा जारी रखने और इस अभियान के दीर्घकालिक सहभागी बनने के लिए प्रेरित किया जाता है। समय के साथ कई स्थानीय निवासी इस अभियान को सामाजिक और पर्यावरणीय दायित्व के रूप में देखने लगे हैं। स्वयंसेवकों को नियमित रूप से ऐसी तस्वीरें प्राप्त होती हैं जिनमें गौरैया, फाख्ता, बटेर और कई अन्य पक्षी भीषण गर्मी के दौरान सकोरों के आसपास पानी पीते और खेलते दिखाई देते हैं। ये छोटे-छोटे दृश्य एक ओर पर्यावरणीय संकट को दर्शाते हैं, तो दूसरी ओर सामुदायिक उम्मीद और संवेदनशीलता की तस्वीर भी प्रस्तुत करते हैं।










