मध्यप्रदेश का भिंड जिला मुख्यतः ग्रामीण आबादी वाला क्षेत्र है। प्रदेश के अन्य विकसित जिलों की तुलना में भिंड अपेक्षाकृत पिछड़ा माना जाता है। यहां की अधिकांश आबादी कृषि पर निर्भर है और यही उनकी आजीविका का प्रमुख साधन भी है। इस कारण भिंड की अर्थव्यवस्था को कृषि आधारित कहा जाता है। हालांकि, जिले का मालनपुर क्षेत्र औद्योगिक दृष्टि से काफी विकसित हो चुका है। औद्योगिक विस्तार के चलते यहां प्रदूषण और गंदगी में बढ़ोतरी हुई है, जिसका सीधा असर पर्यावरण, खेती और लोगों के खान–पान पर पड़ रहा है।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए मालनपुर क्षेत्र के 12 गांवों में पर्यावरणीय संतुलन, शुद्ध खान–पान और बेहतर जनजीवन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लैंडस्टेक, गोदरेज और परहित संस्था ने मिलकर “सहज प्रोजेक्ट” की शुरुआत की। इस प्रोजेक्ट के तहत एक ईको क्लब बनाया गया, जो गांवों में पेड़–पौधों के संरक्षण, पशु–पक्षियों की देखभाल, बाल विकास और पर्यावरण जागरूकता जैसे विषयों पर कार्य कर रहा है।
ईको क्लब के माध्यम से सिंहवारी, इकहारा और लहचुरा गांवों में “किचिन गार्डन” कार्यक्रम शुरू किया गया। सिंहवारी गांव में 290 घर और 1161 मतदाता, इकहारा में 194 घर और 1150 मतदाता, जबकि लहचुरा में 190 घर और 1003 मतदाता हैं। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य ग्रामीणों को रसायन मुक्त, ताजी और शुद्ध सब्जियां उपलब्ध कराना है। किचिन गार्डन आमतौर पर घर के पास या छत के किसी कोने में कम से कम 10×10 फीट की जगह में तैयार किया जाता है, जहां आलू, टमाटर, बैंगन, धनिया, पालक, लौकी जैसी सब्जियों के साथ–साथ फल और औषधीय पौधे भी उगाए जाते हैं।

इस पहल के जमीनी क्रियान्वयन को समझने के लिए जब हमारी बातचीत परहित संस्था की सुपरवाइजर रेखा भदौरिया से हुई, तो उन्होंने बताया कि शुरुआत में किचिन गार्डन जैसा कोई स्पष्ट विचार नहीं था। टीम ने पहले एक ईको क्लब बनाया जिसमें 25 बच्चे–बच्चियां शामिल हैं। इस क्लब के तहत एक पीआर समूह गठित किया गया, जिसने तीनों गांवों का सर्वे किया।
रेखा बताती हैं कि, ‘सर्वे के दौरान आमतौर पर सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी समस्याएं सामने आती हैं, लेकिन इस बार एक अलग समस्या उभरकर आई—सब्जियों की उपलब्धता। ग्रामीणों को बाजार से सब्जियां खरीदने में दूरी, महंगाई और ताजगी की कमी जैसी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। इसके साथ ही यह भी पाया गया कि अधिकांश घरों के पास थोड़ी–बहुत खाली जगह मौजूद है, जो उपयोग में नहीं लाई जा रही थी। इसी आधार पर टीम ने किचिन गार्डन का सुझाव ग्रामीणों के सामने रखा।,
इसके बाद वह कहती हैं कि, ‘शुरुआत में ग्रामीणों ने किचिन गार्डन पर भरोसा नहीं किया और उन्हें लगा कि इससे संस्थाओं को कोई फायदा होगा। ऐसे में टीम के सदस्यों ने खुद अपने स्तर पर किचिन गार्डन बनाकर दिखाया और उसमें सब्जियां उगाईं। इसके बाद ग्रामीणों का भरोसा बढ़ा और उन्होंने इस पहल को अपनाना शुरू किया। नवंबर 2025 से यह कार्यक्रम सक्रिय रूप से लागू हुआ।,

रेखा आगे बताती हैं कि, ‘किचिन गार्डन केवल घरों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई किसानों ने इसे अपने खेतों में भी अपनाया है। अब तक तीनों गांवों में 92 किचिन गार्डन स्थापित किए जा चुके हैं। लक्ष्य है कि ये गांव भविष्य में किचिन गार्डन के मॉडल गांव बनें। इसके अलावा 9 और गांवों में इस योजना को विस्तार देने की तैयारी चल रही है। हालांकि, बीज, खाद, पानी और बिजली जैसी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए बीज बैंक बनाने और जैविक खाद तैयार करने का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।,
परहित संस्था की फैसिलेटर अरुणा धाकड़ बताती हैं कि, ‘अब किचिन गार्डन केवल घरेलू जरूरत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसे आजीविका के साधन के रूप में भी देखा जा रहा है। ग्रामीण इसे खेतों तक ले जा रहे हैं और उत्पादन बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। किचिन से निकलने वाले अपशिष्ट जैसे पानी, सब्जियों के छिलके और राख का उपयोग भी गार्डन खाद्य के रूप में किया जा रहा है।,
अरुणा के अनुसार, ‘इस पहल से ग्रामीणों की बाजार पर निर्भरता कम हुई है और वे बिना रसायन के अनोखी सब्जियां उगा रहे हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि एक परिवार ने 5 फीट लंबी लौकी उगाई, जिसका बीज भी संरक्षित किया गया।,
वह यह भी बताती हैं कि, ‘सब्जियां रोजमर्रा की जरूरत हैं, जिन्हें लंबे समय तक संग्रहित नहीं किया जा सकता। ऐसे में घर के पास ही ताजी सब्जियां उपलब्ध होना बेहद जरूरी है। किचिन गार्डन का काम मुख्य रूप से महिलाएं और बच्चे करते हैं, जबकि पुरुष फैक्ट्री या अन्य कामों में लगे रहते हैं। हालांकि, इसकी देखभाल पूरे परिवार द्वारा मिलकर की जाती है।
इसके बाद वह कहती हैं कि, ‘सिंहवारी, इकहारा और लहचुरा गांवों की मालनपुर से दूरी 8 से 15 किलोमीटर के बीच है, जिससे सब्जियां लाने में समय और पैसा दोनों खर्च होते हैं। ऐसे में किचिन गार्डन एक बेहतर विकल्प बनकर सामने आया है। कीटों से बचाव के लिए राख और नीम के घोल का उपयोग किया जाता है। वहीं, ग्रामीणों को पालक, मैथी, लौकी, तोरई, मूली और धनिया के बीज भी मुफ्त उपलब्ध कराए गए हैं।,

सिंहवारी गांव की आंगनबाड़ी सहायिका रेखा धाकड़ ने अपने घर की छत पर किचिन गार्डन तैयार किया है। उन्होंने मिट्टी और गोबर की खाद का उपयोग कर टमाटर, पालक, मैथी, मूली, धनिया और मिर्च जैसी सब्जियां उगाई हैं। साथ ही पुदीना, तुलसी, गुलाब और औषधीय पौधे भी लगाए हैं।
वे बताती हैं कि, ‘गांव में कई परिवार अब इस पहल से जुड़ चुके हैं और विशेष रूप से महिलाओं की भूमिका इसमें अहम है। कुछ परिवारों ने एक ही प्रकार की सब्जी उगाकर छोटे–छोटे “विशेष गार्डन” बना लिए हैं, जैसे किसी ने केवल टमाटर ही उगाए हैं। इससे सब्जियों पर होने वाला खर्च कम हुआ है और आत्मनिर्भरता बढ़ी है।,
बच्चों में भी इस पहल को लेकर उत्साह देखने को मिल रहा है। कक्षा 9वीं की छात्रा वंशिका सिसोदिया बताती हैं कि, ‘उन्होंने अपने गार्डन में पालक, मैथी, बैंगन, धनिया के साथ अनार, चीकू और बेल के पौधे लगाए हैं। इससे घर का माहौल हरा–भरा हो गया है और शुद्ध ऑक्सीजन मिल रही है।,
कक्षा 8वीं के छात्र आदित्य सिसोदिया कहते हैं कि, ‘उन्होंने चना, धनिया और मिर्च उगाई है, जिसमें चने की पैदावार सबसे अच्छी रही। उनके अनुसार सीमित आय वाले ग्रामीण परिवारों के लिए किचिन गार्डन एक बहुत उपयोगी पहल है।,
आखिर में हमारी बात कक्षा 9 वीं की छात्र खुशबू कुशवाहा से होती है। वे कहती हैं कि, ‘किचिन गार्डन की सब्जियां हमें बाजार की सब्जियों की अपेक्षा ताजगी, शुद्धता और पौष्टिकता का एहसास देती हैं। घर की सब्जियां हमारे स्वास्थ्य में बेहद लाभकारी हैं। वहीं, किचन गार्डन में सब्जियों के लिए की गयी मेहनत से हमारा शरीर भी तंदुरुस्त हो रहा है। मेरा मानना है अच्छी शारीरिक समृद्धि के किचिन गार्डन सभी अपनाएं।,
आखिरकार, संस्थाओं के सदस्यों और ग्रामीणों के विचारों से किचिन गार्डन की जरूरत और महत्वपूर्णता को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। किचिन गार्डन कैसे ग्रामीण स्तर पर बाजार की दूरी, महंगाई, शुद्ध सब्जियों की प्राप्ति, समय की बचत को सहज बना सकता है यह लोगों को समझने की जरूरत है। वास्तव में, किचिन गार्डन ना सिर्फ घरों के व्यर्थ खाद्य पदार्थों के सही उपयोग का एक विकल्प है बल्कि यह, बाजारवाद में बढ़ते सब्जियों के दामों से लड़ने की एक मजबूत राह भी है।















