मेरे घर के बिल्कुल पास रहने वाली माया को अपनी उम्र नहीं पता। देखने में वह करीब 13-14 साल की लगती है। माया खेतों में मजदूरी करती है, जिससे उसे रोज लगभग 300 रुपये मिल जाते हैं।
मैंने उससे पूछा कि वह स्कूल क्यों नहीं जाती। उसने जवाब दिया कि यहां स्कूल ही नहीं है। यह बात मुझे पहले से पता थी। माया स्कूल जाना चाहती है। वह कहती है कि पढ़-लिखकर नौकरी करना चाहती है, लेकिन कौन-सी नौकरी करना चाहती है, यह उसे भी नहीं पता। उसके पापा कंस्ट्रक्शन में मजदूरी करते हैं और मम्मी घर संभालती हैं। माया की मम्मी भी चाहती हैं कि उनके बच्चे पढ़ें, लेकिन उनकी मजबूरियां उन्हें ऐसा नहीं करने देतीं।

इंदौर के पास सिमरोल गांव है। यहां प्रदेश का बड़ा इंजीनियरिंग संस्थान, आईआईटी इंदौर स्थित है। आईआईटी की दीवार के बिल्कुल पास मेरा गांव बल्दा फॉर्म बसा हुआ है। हमारे गांव की आबादी करीब एक हजार लोगों की है।

आईआईटी की ऊंची दीवार गांव के कई घरों से लगी हुई है। लेकिन विडंबना यह है कि जिन घरों के बच्चे उस दीवार के सबसे पास रहते हैं, उनमें से कई कभी स्कूल नहीं गए। गांव में स्कूल नहीं है। जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति ठीक है, वे अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल भेज देते हैं। लेकिन गरीब परिवारों के लिए यह संभव नहीं है।
गांव में ज्यादातर आदिवासी भील समाज के लोग रहते हैं। वे खेतों में मजदूरी करते हैं, बांस की टोकरियां बनाते हैं और इसी से अपना गुजारा चलाते हैं।

राधा अब करीब 17 साल की है। वह अपना नाम लिख लेती है क्योंकि कई साल पहले उसने आंगनवाड़ी में कुछ समय पढ़ाई की थी। इसके बाद वह कभी स्कूल नहीं जा सकी। किशन करीब 8 साल का है। उसने आज तक स्कूल नहीं देखा। उसने सिर्फ आंगनवाड़ी में किताबें देखी हैं।
गांव में ऐसे लगभग 50 बच्चे हैं जिन्होंने कभी स्कूल नहीं देखा। वे पढ़ना चाहते हैं, स्कूल जाना चाहते हैं, लेकिन उनके पास कोई साधन नहीं है।

सबसे नजदीकी सरकारी स्कूल सिमरोल में है, जो यहां से करीब 4 किलोमीटर दूर है। छोटे बच्चों के लिए रोज इतनी दूर पैदल जाना संभव नहीं है। गांव में लंबे समय से स्कूल नहीं होने के कारण अब लोगों को इसकी कमी महसूस होना भी कम हो गया है। जैसे बिना स्कूल के जीवन की आदत पड़ गई हो।
गांव में स्कूल खुलवाने की मांग को लेकर मैंने शिक्षा विभाग के अधिकारियों को जानकारी दी है। इस काम में देशगांव मीडिया फाउंडेशन के साथियों ने भी मेरी मदद की है। हमें उम्मीद है कि इस समस्या पर जल्द ध्यान दिया जाएगा। अगर प्रयास सफल होते हैं तो इस बस्ती के बच्चों को भी स्कूल जाने का मौका मिल सकता है।
मेरा नाम पूर्णिमा दायले है। मैं इसी बस्ती में रहती हूं। मेरे माता-पिता के सहयोग से मुझे पढ़ने का अवसर मिला और अब मैंने वकालत की पढ़ाई पूरी कर ली है।
मैं देशगांव मीडिया फाउंडेशन के साथ सामुदायिक पत्रकारिता और नेतृत्व क्षमता विकास के बारे में सीख रही हूं। फाउंडेशन के सहयोग से यह मेरे जीवन की पहली लिखित रिपोर्ट है। इस रिपोर्ट को तैयार करते समय मुझे पहली बार एहसास हुआ कि हमारे आसपास की यह समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है।










