चिता आंदोलन का 35वां दिन: मिट्टी-पत्ते लगाकर किया जल सत्याग्रह, अमित भटनागर का अनशन 20वें दिन में


केन-बेतवा, मझगाय और रूँझ परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों के मुआवजे, पुनर्वास और विस्थापन के सवालों पर आंदोलन जारी; जल-जंगल-जमीन के अधिकारों की रक्षा के लिए आदिवासी किसानों और महिलाओं ने जताया विरोध


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उनकी बात Published On :

केन-बेतवा, मझगाय और रूँझ परियोजनाओं से जुड़े पर्यावरणीय नुकसान, विस्थापन, मुआवजे और पुनर्वास के सवालों को लेकर जारी चिता आंदोलन शुक्रवार को 35वें दिन में पहुंच गया। इस दौरान आदिवासी किसानों और महिलाओं ने अपने शरीर पर मिट्टी लगाकर, पेड़ों के पत्ते बांधकर और पानी में उतरकर जल सत्याग्रह किया। आंदोलनकारियों ने इस प्रदर्शन के जरिए जल, जंगल, जमीन और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की मांग उठाई। वहीं, जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर का आमरण अनशन 20वें दिन में पहुंच गया है। संगठन की ओर से जारी विज्ञप्ति के मुताबिक, लगातार अनशन के कारण उनके स्वास्थ्य में तेजी से गिरावट आ रही है।

आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने चिता और फांसी के प्रतीकों के जरिए भी अपना विरोध दर्ज कराया। मिट्टी और पेड़ों के पत्तों के साथ किया गया प्रदर्शन प्रभावित आदिवासी परिवारों के प्रकृति, जमीन और अपनी पारंपरिक जीवनशैली से जुड़ाव को सामने लाने की कोशिश थी। आंदोलनकारियों का कहना है कि विकास परियोजनाओं के कारण होने वाले विस्थापन को केवल जमीन अधिग्रहण या मुआवजे तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इससे लोगों की आजीविका, सामाजिक जीवन, संस्कृति और भविष्य भी प्रभावित होता है।

आंदोलन में शामिल परिवारों की प्रमुख मांग है कि विस्थापन से पहले पात्र लोगों को नियमानुसार मुआवजा और पुनर्वास का अधिकार सुनिश्चित किया जाए। उनका कहना है कि प्रभावित परिवारों की समस्याओं पर गंभीरता से सुनवाई हो और उनका समयबद्ध समाधान निकाला जाए। लंबे समय से जारी आंदोलन के बीच प्रदर्शनकारियों में सरकार और प्रशासन के प्रति असंतोष बढ़ने की बात भी सामने आई है।

चिता आंदोलन के 35वें दिन के साथ अमित भटनागर का आमरण अनशन भी महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंच गया है। जय किसान संगठन की मीडिया सेल के मुताबिक, उनके स्वास्थ्य में तेजी से गिरावट आ रही है। इससे आंदोलन से जुड़े लोगों और प्रभावित परिवारों की चिंता बढ़ गई है। आंदोलनकारियों ने मांग की है कि मुआवजे, पुनर्वास और विस्थापन से जुड़े मुद्दों पर ठोस कार्रवाई की जाए, ताकि प्रभावित परिवारों को न्याय मिल सके।

मिट्टी, पेड़ों के पत्तों और जल सत्याग्रह के जरिए आंदोलनकारियों ने यह संदेश देने की कोशिश की कि जल, जंगल और जमीन उनके लिए महज प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और अस्तित्व का आधार हैं। अब इस आंदोलन में उठाए गए सवालों पर शासन-प्रशासन की प्रतिक्रिया और प्रभावित परिवारों की मांगों पर होने वाली कार्रवाई का इंतजार है।

स्रोत: जय किसान संगठन की मीडिया सेल की विज्ञप्ति।



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