क्या भारतीय ज्ञान प्रणाली बदल देगी शिक्षा? दुर्ग सम्मेलन में लैंगिक समानता पर बड़ा मंथन


दुर्ग में आयोजित IKS सम्मेलन 2026 में शिक्षक शिक्षा में भारतीय ज्ञान प्रणाली और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने पर देशभर के विशेषज्ञों ने मंथन किया।


DeshGaon
पढ़ाई-लिखाई Published On :

छत्तीसगढ़ के दुर्ग से शिक्षा जगत के लिए एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है, जहां 13 से 16 मार्च 2026 तक भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) और लैंगिक समानता पर केंद्रित चार दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। आशा पारस फॉर पीस एंड हार्मनी फाउंडेशन (APPHF India) और हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस सम्मेलन में देशभर से शिक्षाविदों, शोधार्थियों और सामाजिक विशेषज्ञों ने भाग लिया।

सम्मेलन में यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि यदि भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षक शिक्षा में शामिल किया जाए, तो शिक्षा प्रणाली अधिक समावेशी, व्यावहारिक और लैंगिक समानता आधारित बन सकती है।

 

उद्घाटन सत्र: नई शिक्षा दिशा की शुरुआत

सम्मेलन का उद्घाटन 13 मार्च को श्री शंकराचार्य महाविद्यालय, जुनवानी (दुर्ग) में हाइब्रिड मोड में हुआ। प्रो. आर.के. शुक्ला ने स्वागत भाषण में भारतीय ज्ञान प्रणाली की प्रासंगिकता को रेखांकित किया।

प्रो. आशा शुक्ला ने सम्मेलन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए इसे शिक्षा सुधार की दिशा में एक सार्थक कदम बताया। मुख्य वक्ता प्रो. मनोज कुमार सक्सेना ने शिक्षक शिक्षा में भारतीय दृष्टिकोण को शामिल करने पर जोर दिया।

मुख्य अतिथि प्रो. साकेत कुशवाहा और कुलपति प्रो. संजय तिवारी ने कहा कि आधुनिक शिक्षा में भारतीय मूल्यों का समावेश समय की आवश्यकता बन चुका है।

 

शिक्षक शिक्षा में IKS: बदलाव की नई सोच

दूसरे सत्र में “Reimagining Teacher Education through IKS Lens” विषय पर चर्चा हुई। विशेषज्ञों का मानना रहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल इतिहास नहीं, बल्कि आधुनिक शिक्षा को दिशा देने वाला सशक्त माध्यम है।

इस सत्र में यह बात उभरकर सामने आई कि शिक्षक प्रशिक्षण को भारतीय संदर्भों से जोड़ने पर विद्यार्थियों में बेहतर समझ और संवेदनशीलता विकसित होती है।

दूसरा दिन: संस्कृति और समानता पर गहन चर्चा

14 मार्च को आयोजित सत्रों में शिक्षा को सांस्कृतिक रूप से प्रासंगिक बनाने पर जोर दिया गया। “Culturally Responsive Pedagogy” विषय पर वक्ताओं ने कहा कि स्थानीय परंपराओं और मूल्यों को शिक्षा में शामिल करना जरूरी है।

वहीं “Gender Bias and Stereotypes” विषय पर चर्चा के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि भारतीय ज्ञान परंपरा में समानता और संतुलन के कई उदाहरण मौजूद हैं, जिन्हें आज के पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सकता है।

 

तकनीक और समाज की भागीदारी पर फोकस

तीसरे दिन “IKS and Technology for Gender Equality” और “Community Engagement” विषयों पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने सुझाव दिया कि डिजिटल तकनीक और समुदाय की भागीदारी से शिक्षा को अधिक सुलभ और समान बनाया जा सकता है।

इस दौरान यह भी सामने आया कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच शिक्षा की खाई को कम करने में भारतीय ज्ञान प्रणाली महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

 

शोधपत्रों में दिखी नई सोच

चौथे दिन शोधार्थियों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए, जिनमें शिक्षक शिक्षा और लैंगिक समानता से जुड़े विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला गया। विशेषज्ञों ने इन शोधों को व्यावहारिक दिशा देने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए।

समापन सत्र में वक्ताओं ने एकमत से कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा में शामिल किए बिना समावेशी और संतुलित समाज की कल्पना अधूरी है।

सम्मेलन ने यह संदेश दिया कि शिक्षा केवल ज्ञान देने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का आधार भी है।

 



Related