महिला आरक्षण के बाद भी क्यों खाली रह गई महिलाओं की सीटें?


महिला आरक्षण कानून के बाद भी चुनावों में महिलाओं को सीमित टिकट मिल रहे हैं। आंकड़ों से खुलासा, पार्टियों ने नहीं बढ़ाई भागीदारी।


DeshGaon
बड़ी बात Published On :

महिला आरक्षण कानून लागू होने के बावजूद देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की रफ्तार उम्मीद के मुताबिक नहीं दिख रही है। हालिया विधानसभा चुनावों के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि ज्यादातर राजनीतिक दलों ने महिला उम्मीदवारों की संख्या में केवल मामूली बढ़ोतरी की है, जबकि कुछ मामलों में तो यह संख्या घट भी गई है। यह स्थिति बताती है कि कानून बनने के बाद भी जमीनी स्तर पर बदलाव अभी धीमा है।

2023 में महिला आरक्षण कानून पारित होने के बाद उम्मीद थी कि राजनीतिक दल चुनावों में ज्यादा संख्या में महिलाओं को टिकट देंगे। लेकिन असम, केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे राज्यों के आंकड़े इस उम्मीद पर खरे नहीं उतरते। इन राज्यों में अधिकतर पार्टियों ने महिलाओं को टिकट देने में केवल हल्की बढ़ोतरी की, जबकि पांच मामलों में तो महिला उम्मीदवारों की संख्या कम हो गई।

पश्चिम बंगाल की बात करें तो कांग्रेस ने 2021 के मुकाबले इस बार ज्यादा महिलाओं को टिकट दिया है—7 से बढ़ाकर 35। हालांकि कुल उम्मीदवारों के अनुपात में यह बढ़त सीमित ही है। वहीं तृणमूल कांग्रेस ने लगभग अपनी स्थिति बरकरार रखी है, जबकि भाजपा ने महिलाओं की संख्या 38 से घटाकर 33 कर दी है।

तमिलनाडु में डीएमके और एआईएडीएमके दोनों ने लगभग बराबर संख्या में महिलाओं को टिकट दिया है। डीएमके ने 2021 के मुकाबले छह महिलाओं को ज्यादा मौका दिया, लेकिन कुल प्रतिशत अभी भी करीब 11% ही है। केरल में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने महिलाओं की संख्या घटाई, जबकि वाम दलों ने मामूली वृद्धि की।

असम में कांग्रेस ने 9 से बढ़ाकर 13 महिलाओं को टिकट दिया, जबकि भाजपा ने 7 से घटाकर 6 महिलाओं को मौका दिया। कुल मिलाकर यहां भी महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी सीमित ही रही।

अगर 2023 के बाद हुए चुनावों को देखें, तो केवल कुछ ही उदाहरण ऐसे हैं जहां 20% से ज्यादा महिला उम्मीदवार उतारी गईं। सिक्किम में कांग्रेस ने 33.3% महिलाओं को टिकट दिया, जबकि झारखंड में AJSU पार्टी ने 30% महिलाओं को मैदान में उतारा। ओडिशा में बीजद, झारखंड और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस, और केरल में CPI जैसे कुछ उदाहरण ही हैं जहां यह आंकड़ा 20% के पार गया।

राष्ट्रीय स्तर पर भी स्थिति ज्यादा अलग नहीं है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों में महिलाओं की भागीदारी कुछ राज्यों में बढ़ी जरूर है, लेकिन यह वृद्धि व्यापक नहीं है। कई राज्यों में तो महिलाओं की हिस्सेदारी में गिरावट भी दर्ज की गई है।

विश्लेषण यह भी दिखाता है कि जहां-जहां महिलाओं के लिए नकद सहायता या योजनाएं चुनावी मुद्दा बनीं, वहां महिला उम्मीदवारों की संख्या में कुछ वृद्धि हुई। बावजूद इसके, यह बढ़ोतरी भी सीमित दायरे में ही रही।

 

साभार: देशगाँव का यह लेख इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट का अनुवाद है। मूल रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है। क्लिक करें 



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