हाईकोर्ट का बड़ा फैसला… भोजशाला में मस्जिद नहीं वाग्देवी का मंदिर, हाई अलर्ट पर धार शहर


धार की भोजशाला–कमाल मौला मस्जिद विवाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए परिसर को मां वाग्देवी का मंदिर माना है। फैसले के बाद धार में सुरक्षा बढ़ा दी गई है।


आशीष यादव आशीष यादव
बड़ी बात Updated On :

धार की ऐतिहासिक भोजशाला–कमाल मौला मस्जिद विवाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए परिसर को मां वाग्देवी का मंदिर माना है। इंदौर खंडपीठ की डिवीजन बेंच ने लंबे समय से चल रहे इस धार्मिक और ऐतिहासिक विवाद पर सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुनाया। फैसले के बाद धार सहित पूरे मालवा क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और प्रशासन हाई अलर्ट पर है।

यह मामला केवल एक धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वर्षों से इतिहास, पुरातत्व, आस्था और प्रशासनिक अधिकारों के बीच कानूनी संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। हाईकोर्ट में पांच मूल याचिकाओं और तीन इंटरवेंशन आवेदन पर लगातार 24 दिनों तक सुनवाई चली थी। सुनवाई पूरी होने के बाद 12 मई को अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। इसके बाद शुक्रवार 15 मई को अदालत ने अपना निर्णय सुनाया।

क्या है भोजशाला विवाद का इतिहास

धार की भोजशाला को हिंदू पक्ष मां सरस्वती यानी वाग्देवी का प्राचीन मंदिर और शिक्षा केंद्र बताता रहा है। दावा किया जाता है कि परमार वंश के राजा भोज ने 11वीं शताब्दी में इसका निर्माण कराया था। हिंदू पक्ष का कहना है कि वर्ष 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में मंदिर को क्षतिग्रस्त कर उसके अवशेषों से कमाल मौला मस्जिद बनाई गई। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष इसे सदियों पुरानी मस्जिद बताता आया है, जहां लंबे समय से नमाज अदा की जाती रही है।

वर्ष 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने एक व्यवस्था लागू की थी, जिसके तहत मंगलवार और वसंत पंचमी पर हिंदू समाज को पूजा की अनुमति दी गई, जबकि शुक्रवार को मुस्लिम समाज को जुमे की नमाज पढ़ने की इजाजत दी गई। बाकी दिनों में परिसर पर्यटकों के लिए खुला रखा गया। यही व्यवस्था वर्षों से लागू रही और कई बार तनाव की स्थिति भी बनी। 2013 और 2016 में वसंत पंचमी और शुक्रवार एक ही दिन पड़ने पर विवाद काफी बढ़ गया था।

2022 में फिर तेज हुआ विवाद

भोजशाला विवाद ने नया मोड़ वर्ष 2022 में लिया, जब हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से रंजना अग्निहोत्री सहित अन्य लोगों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय करने, हिंदू समाज को नियमित पूजा-अर्चना का पूर्ण अधिकार देने, नमाज पर रोक लगाने और परिसर के संचालन के लिए ट्रस्ट गठन की मांग की गई थी। साथ ही ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की प्रतिमा को वापस भारत लाकर भोजशाला में स्थापित करने की मांग भी उठाई गई।

ASI सर्वे और अदालत में पेश हुए तर्क

मामले में सबसे अहम मोड़ तब आया जब वर्ष 2024 में ASI ने भोजशाला परिसर का 98 दिन तक वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया। हिंदू पक्ष ने इस सर्वे, स्थापत्य अवशेषों, शिलालेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर मंदिर होने का दावा मजबूत किया। अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने अदालत में परमारकालीन ग्रंथ ‘समरांगण सूत्रधार’ का उल्लेख करते हुए कहा कि भोजशाला की संरचना प्राचीन मंदिर वास्तुकला से मेल खाती है।

दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष ने ASI रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने दलील दी कि परिसर लंबे समय से मस्जिद के रूप में उपयोग में रहा है और धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है। उन्होंने यह भी कहा कि अयोध्या विवाद की तरह यहां कोई स्थापित मूर्ति मौजूद नहीं है।

1935 की व्यवस्था भी बनी बहस का केंद्र

सुनवाई के अंतिम चरण में एक इंटरवेनर ने अदालत को बताया कि वर्ष 1935 में तत्कालीन धार रियासत नमाज की अनुमति देने के लिए सक्षम प्राधिकारी थी। इसी आधार पर मुस्लिम पक्ष ने पुरानी प्रशासनिक व्यवस्था का हवाला देते हुए अपने अधिकारों की दलील रखी। इसी बिंदु पर अदालत ने विस्तृत सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखा था।

फैसले के बाद हाई अलर्ट

फैसले को देखते हुए धार, इंदौर और कई अन्य जिलों में भारी पुलिस बल तैनात किया गया। धार में करीब 1200 पुलिसकर्मियों के साथ RAF और रिजर्व पुलिस बल को भी लगाया गया। शहर में फ्लैग मार्च निकाला गया और संवेदनशील इलाकों में ड्रोन से निगरानी की गई। प्रशासन ने लोगों से शांति बनाए रखने और अफवाहों से बचने की अपील की।

शुक्रवार होने के कारण स्थिति और संवेदनशील मानी गई, क्योंकि इसी दिन मुस्लिम समाज भोजशाला परिसर में जुमे की नमाज अदा करता है। अदालत के फैसले के बाद भी प्रशासन ने कानून व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए पूरे इलाके को सुरक्षा घेरे में रखा।

आगे क्या होगा

कानूनी जानकारों का मानना है कि हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकता है। मुस्लिम पक्ष पहले ही संकेत दे चुका है कि अंतिम कानूनी विकल्पों पर विचार किया जाएगा। वहीं हिंदू संगठनों ने फैसले का स्वागत करते हुए इसे “ऐतिहासिक न्याय” बताया है।

भोजशाला विवाद अब केवल धार या मध्य प्रदेश का मुद्दा नहीं रह गया, बल्कि यह देश में धार्मिक स्थलों से जुड़े ऐतिहासिक दावों और संवैधानिक अधिकारों पर होने वाली बहस का बड़ा उदाहरण बन चुका है।