नरवाई जलाना: जुर्माना, नुकसान और किसानों की मजबूरी का पूरा सच


नरवाई जलाना किसानों की मजबूरी बनता जा रहा है, जहां बढ़ती लागत और प्रशासनिक सख्ती के बीच वे फंसे हैं। यह समस्या न सिर्फ मिट्टी की उर्वरता को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि पर्यावरण और खेती के भविष्य पर भी सवाल खड़े कर रही है।


amit bhatore अमित भटोरे
खरगोन Published On :

नरवाई की आग: मजबूरी, सख्ती और समाधान के बीच जूझता किसान

खरगोन। जिले में इन दिनों खेतों में उठती नरवाई की आग सिर्फ फसल अवशेषों को नहीं जला रही, बल्कि किसानों की मजबूरी, प्रशासन की सख्ती और पर्यावरणीय चिंता के बीच टकराव को भी उजागर कर रही है। हाल ही में गेहूं की नरवाई जलाने पर दो किसानों पर जुर्माना लगाए जाने के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है।

देवली और कोठा बुजुर्ग के किसान गिरधारी राठौड़, महेश कुशवाह और दशरथ राठौड़ बताते हैं कि फसल कटाई के बाद खेत में बची नरवाई को हटाना आसान नहीं होता। यदि इसे मशीनों या मजदूरी के जरिए साफ किया जाए, तो खर्च कई गुना बढ़ जाता है। छोटे और मध्यम किसान पहले ही बढ़ती लागत, महंगे बीज, खाद और डीजल की मार झेल रहे हैं। ऐसे में अतिरिक्त खर्च उठाना उनके लिए संभव नहीं होता। यही वजह है कि वे मजबूरी में नरवाई जलाने का विकल्प चुनते हैं।

किसान मानते हैं कि नरवाई जलाने से मिट्टी के जरूरी पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं और पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है, लेकिन विकल्प महंगे होने के कारण वे खुद को असहाय महसूस करते हैं। उनका कहना है कि यदि सरकार कार्रवाई करती है, तो वैकल्पिक समाधान भी उपलब्ध कराने चाहिए।

उल्लेखनीय है कि जिले में करीब 1 लाख 68 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं की खेती की गई है। ऐसे में फसल कटाई के बाद बड़े पैमाने पर नरवाई प्रबंधन की चुनौती सामने आती है।

कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. आर.के. सिंह के अनुसार, नरवाई को पशु चारे के रूप में उपयोग किया जा सकता है। साथ ही जैविक घोल के माध्यम से फसल अवशेषों को खाद में बदला जा सकता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। 2 किलोग्राम डीकंपोजर या प्रोपेल को 2 किलोग्राम गुड़ और 200 लीटर पानी में घोलकर एक एकड़ में छिड़काव करने से फसल अवशेष कार्बनिक खाद में परिवर्तित हो जाते हैं।

उधर, कृषि अभियांत्रिकी विभाग द्वारा गोगावां विकासखंड के ग्राम उदयपुरा में किसान अनोखीलाल सोलंकी के खेत पर फसल अवशेष प्रबंधन का प्रदर्शन किया गया। इस दौरान मल्चर मशीन के जरिए अवशेषों को खेत में मिलाने की प्रक्रिया किसानों को समझाई गई।

प्रदर्शन के दौरान सहायक कृषि यंत्री मनीष मिश्रा ने बताया कि नरवाई जलाने से मिट्टी के सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं और नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं, जिससे जमीन की उर्वरता लगातार घटती है। इसके साथ ही वायु प्रदूषण भी बढ़ता है।

वहीं, उप संचालक कृषि एस.एस. राजपूत ने बताया कि नरवाई जलाने पर 2500 रुपए से लेकर 15 हजार रुपए तक का जुर्माना निर्धारित किया गया है। साथ ही हार्वेस्टर मशीनों में स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम लगाना अनिवार्य किया गया है।

फिलहाल स्थिति यह है कि एक तरफ प्रशासन सख्ती कर रहा है, तो दूसरी ओर किसान आर्थिक दबाव में हैं। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि सख्ती के साथ-साथ किसानों को व्यवहारिक, सस्ते और प्रभावी विकल्प भी उपलब्ध कराए जाएं, ताकि इस समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सके।



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