धर्मशास्त्र में चूहा भगवान गणेश का वाहन माना जाता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह जीव मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। विश्व चूहा दिवस के अवसर पर सेवानिवृत्त वरिष्ठ कीट वैज्ञानिक सतीश परसाई ने चूहों से होने वाले नुकसान और उनसे बचाव के उपायों पर विस्तृत जानकारी साझा की।
उन्होंने बताया कि चूहे न केवल प्लेग जैसी घातक बीमारियों के वाहक हैं, बल्कि इतिहास में ब्लैक डेथ जैसी महामारी के कारण करोड़ों लोगों की जान जा चुकी है। 14वीं शताब्दी में एशिया और यूरोप में फैली इस महामारी ने करोड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया था।
वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, दुनिया के कुल स्तनधारियों में लगभग एक-तिहाई संख्या चूहों की है। भारत में इनकी संख्या मानव जनसंख्या से लगभग छह गुना अधिक मानी जाती है। चूहे हर साल देश में 6 से 10 प्रतिशत तक अनाज नष्ट कर देते हैं, जो लाखों टन खाद्यान्न और करोड़ों रुपये के नुकसान के बराबर है।
परसाई ने बताया कि चूहे जितना खाते हैं, उससे कई गुना अधिक अनाज अपने मल-मूत्र से खराब कर देते हैं। इनके कारण खेतों, गोदामों और घरों में भारी नुकसान होता है। यहां तक कि ये बिजली के तारों को भी कुतर देते हैं, जिससे कई बार दुर्घटनाएं भी हो चुकी हैं।
चूहों की प्रजनन क्षमता बेहद तेज होती है। एक जोड़ा एक वर्ष में हजारों और कुछ वर्षों में लाखों की संख्या तक बढ़ सकता है। यही कारण है कि समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो इनकी संख्या तेजी से बढ़ जाती है।
रोकथाम के उपायों पर दिया जाए जोर
सतीश परसाई ने बताया कि चूहों से बचाव के लिए गोदामों को पक्का बनाना, पाइप और नालियों पर जालियां लगाना, खेतों में फसल को लंबे समय तक न छोड़ना जैसे उपाय बेहद जरूरी हैं। इसके अलावा पिंजरे, विषैले चारे और धूम्रक दवाओं का उपयोग भी प्रभावी माना जाता है।
उन्होंने कहा कि जिंक फॉस्फाइड जैसे एकमात्रा विष और वारफारिन जैसे बहुमात्रा विष का उपयोग सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए। साथ ही एल्युमिनियम फॉस्फाइड जैसी दवाओं से बिलों में धूम्रक प्रक्रिया अपनाकर भी चूहों पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
सामूहिक प्रयास से ही हो सकेगा समाधान
परसाई ने जोर देकर कहा कि चूहों पर नियंत्रण के लिए व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक अभियान जरूरी है। गांव, खेत और शहर स्तर पर एक साथ प्रयास किए जाएं, तभी इनसे होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि विश्व चूहा दिवस की शुरुआत 2002 में हुई थी, जिसका उद्देश्य चूहों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण और उनके वैज्ञानिक महत्व को समझाना है। हालांकि, आमजन के अनुभव इसके उलट हैं, जहां चूहे एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आते हैं।
उल्लेखनीय है कि इस विषय पर आकाशवाणी खंडवा द्वारा सतीश परसाई की एक विशेष बातचीत भी रिकॉर्ड की गई है, जिसमें उन्होंने विस्तार से जानकारी साझा की है।
























