मालवा–निमाड़ के जंगलों में खिले पलाश, पर संरक्षण की ठोस योजना नदारद


मालवा-निमाड़ के जंगलों में खिले पलाश के फूल, लेकिन संरक्षण और हर्बल रंग योजना नहीं। जानिए कैसे बन सकते हैं रोजगार का साधन।


आशीष यादव आशीष यादव
धार Published On :

धार, मालवा–निमाड़

बसंत ऋतु के आगमन के साथ ही जंगलों और खेतों की मेड़ों पर आग-सी दहकती आभा बिखेरने वाले पलाश के फूल इस बार भी पूरे शबाब पर हैं, लेकिन इनके संरक्षण और उपयोग को लेकर शासन स्तर पर कोई ठोस योजना जमीन पर नजर नहीं आ रही। स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ाने और हर्बल उत्पादों को बढ़ावा देने की बातें तो होती हैं, पर पलाश के फूलों से बनने वाले प्राकृतिक रंग और औषधीय उत्पादों को लेकर पहल कागजों तक सीमित दिखाई देती है।

मालवा–निमाड़ क्षेत्र के जंगलों में बड़ी संख्या में पाए जाने वाले पलाश (वैज्ञानिक नाम: Butea monosperma) को परसा, टेसू और किंशुक जैसे नामों से भी जाना जाता है। बसंत के दौरान जब अधिकांश वृक्षों के पत्ते झरने लगते हैं, तब पलाश के पेड़ लाल, केसरिया और कभी-कभी सफेद फूलों से लद जाते हैं। दूर से देखने पर ये फूल दीपक की लौ की तरह चमकते हैं, जो जंगलों की पहचान बन जाते हैं।

स्थानीय रोजगार और हर्बल रंग की संभावना

पलाश के फूलों का उपयोग परंपरागत रूप से होली के प्राकृतिक रंग बनाने में किया जाता रहा है। इनसे तैयार रंग त्वचा के लिए सुरक्षित माने जाते हैं और आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर होते हैं। आयुर्वेद में पलाश के जड़, तना, फल, फूल और बीज—इन पांचों अंगों का औषधीय महत्व बताया गया है। त्वचा रोग, पाचन संबंधी समस्याओं और कृमिनाशक औषधियों में इसका उपयोग वर्णित है।

जानकारों का मानना है कि यदि तेंदूपत्ता की तर्ज पर पलाश के फूलों का संग्रहण और प्रसंस्करण किया जाए तो ग्रामीणों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिल सकता है। तेंदूपत्ता संग्रहण में मजदूरों को लाभांश दिया जाता है, लेकिन पलाश के फूलों के लिए ऐसी कोई संगठित व्यवस्था नहीं है। पिछले वर्षों में कुछ समितियों के माध्यम से पलाश से हर्बल रंग तैयार कर बाजार में बेचा गया था, पर यह पहल अब बंद हो चुकी है।

संरक्षण की जिम्मेदारी, पर योजना का अभाव

वन विभाग की भूमि पर स्थित पलाश वृक्षों की देखरेख की जिम्मेदारी विभाग की है, लेकिन इनके संरक्षण, संवर्धन और व्यावसायिक उपयोग के लिए अलग से कोई व्यापक योजना फिलहाल लागू नहीं है। मालवा–निमाड़ का विशाल वन क्षेत्र पलाश की प्राकृतिक संपदा से भरपूर है, फिर भी इनके वैज्ञानिक प्रबंधन और बाजार से जोड़ने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि रासायनिक रंगों पर निर्भरता कम कर प्राकृतिक हर्बल रंगों को बढ़ावा दिया जाए। यदि शासन स्तर पर प्रशिक्षण, संग्रहण केंद्र और विपणन सहायता उपलब्ध कराई जाए तो पलाश आधारित उद्योग स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार का सशक्त माध्यम बन सकता है।


पारंपरिक ज्ञान हो रहा विलुप्त ग्रामीण क्षेत्रों में कभी पलाश के फूलों से रंग बनाने की पारंपरिक विधि प्रचलित थी। फूलों को सुखाकर या उबालकर प्राकृतिक रंग तैयार किया जाता था। समय के साथ यह परंपरा कमजोर पड़ती गई और अब नई पीढ़ी इसके उपयोग और लाभों से अनजान होती जा रही है। संरक्षण और प्रचार-प्रसार के अभाव में यह पारंपरिक ज्ञान धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर है।

बसंत की पहचान बन चुके पलाश के फूल केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि रोजगार, स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े अवसर भी हैं। जरूरत इस बात की है कि शासन और प्रशासन मिलकर पलाश संरक्षण योजना, हर्बल रंग उत्पादन और ग्रामीण आजीविका को जोड़ने की ठोस रणनीति तैयार करें, ताकि मालवा–निमाड़ के जंगलों की यह अग्नि-आभा आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके।



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