खेतों में सिमटता बचपन: खेतों में काम करने को मजबूर हजारों बच्चे!


निमाड़ क्षेत्र में हजारों बच्चे आज भी खेतों में मजदूरी करने को मजबूर हैं। गरीबी, कमजोर शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक उदासीनता के बीच बचपन सिमटता जा रहा है—यह रिपोर्ट उसी कड़वी सच्चाई को उजागर करती है।


amit bhatore अमित भटोरे
उनकी बात Published On :

भारत को गांवों का देश कहा जाता है और गांवों की पहचान खेती से होती है। लेकिन इसी खेती के बीच एक ऐसी सच्चाई भी है, जिस पर अक्सर ध्यान नहीं जाता। यह सच्चाई है बाल मजदूरी की।

मध्यप्रदेश के निमाड़ क्षेत्र खरगोन, खंडवा, बुरहानपुर और बड़वानी में आज भी बड़ी संख्या में बच्चे खेतों में काम करते नजर आते हैं। कई बार यह बच्चों को लोडिंग वाहनों में ले जाया जाता है। इससे उनकी जान पर बन आती है।

हाल ही में 18 मार्च को बड़वानी जिले में मजदूरी के लिए मजदूरों को लोडिंग वाहन से ले जाया जा रहा था। यह वाहन अनियंत्रित होकर पलट गया। इस वाहन में 10 वर्ष से लेकर 60 वर्ष तक के मजदूर शामिल थे।

इनमें से 13 वर्षीय बालक की मौत हो गई। जबकि 20 लाेग घायल हाे गए थे। बीते वर्षाें में खरगोन व बड़वानी जिलों में ऐसी घटनाओं में बच्चों की मौत और घायल होने की घटनाएं हो चुकी है।

समाजसेवी रामेश्वर बड़ोले ने बताया कि जिन बच्चों को इस उम्र में स्कूल जाना चाहिए, वे खेतों में मजदूरी करने को मजबूर है। सुबह होते ही कई गांवों में बच्चे अपने माता-पिता के साथ या समूह में खेतों की ओर निकल जाते हैं। दिनभर वे निंदाई, गुड़ाई, बुवाई, कटाई और खाद डालने जैसे काम करते हैं।

शाम तक काम करने के बाद उन्हें बहुत कम मजदूरी मिलती है। कई बार यह पैसे सीधे उनके परिवार को दिए जाते हैं। धीरे-धीरे यह काम उनकी दिनचर्या बन जाता है और पढ़ाई पीछे छूट जाती है।

वरिष्ठ पत्रकार राकेश जायसवाल के अनुसार निमाड़ क्षेत्र में यह समस्या ज्यादा इसलिए दिखाई देती है क्योंकि यहां का बड़ा हिस्सा आदिवासी और ग्रामीण इलाका है। यहां के कई परिवार आर्थिक रूप से कमजोर है। खेती ही उनका मुख्य काम है, लेकिन इससे हमेशा पर्याप्त आमदनी नहीं हो पाती।

निमाड़ क्षेत्र में करीब 12 लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन पर खेती होती है और इस पूरे क्षेत्र की आबादी लगभग 70 लाख के आसपास है।

ऐसे में कृषि कार्यों में श्रमिकों की बड़ी मांग रहती है, जिसका असर बच्चों पर भी पड़ता है। लेकिन यह केवल मजबूरी का मामला नहीं है, यह बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन भी है। भारत का संविधान बच्चों को पढ़ाई का अधिकार देता है।

6 से 14 साल तक के बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य और मुफ्त है। साथ ही 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम कराना कानूनन गलत है। इसके बावजूद खेतों में बच्चों से काम लिया जा रहा है, जो चिंता की बात है।

अगर आंकड़ों पर नजर डाले तो समस्या की गंभीरता और साफ हो जाती है। जनगणना 2011 के अनुसार भारत में करीब 1.01 करोड़ बच्चे बाल मजदूरी कर रहे हैं, जिनमें 56 लाख लड़के और 45 लाख लड़कियां शामिल हैं। वहीं वैश्विक स्तर पर स्थिति और भी चिंताजनक है।

इंटनेशनल लेबर आर्गेनाइजेशन के अनुसार साल 2020 के आसपास दुनिया भर में करीब 16 करोड़ बच्चे बाल श्रम में लगे हुए थे, यानी हर 10 में से 1 बच्चा किसी न किसी रूप में काम कर रहा है।

सबसे बड़ी बात यह है कि इन बच्चों में से लगभग 60 प्रतिशत बच्चे कृषि क्षेत्र में ही काम करते हैं। यानी खेतों में काम करने वाले बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा है। यह स्थिति निमाड़ जैसे कृषि प्रधान क्षेत्र में और भी गंभीर हो जाती है।

बाल श्रमिक (निषेध एवं नियंत्रण) अधिनियम 1986 के तहत 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम कराना प्रतिबंधित है। अगर कोई ऐसा करता है तो उसके खिलाफ सजा और जुर्माने का प्रावधान है। इसमें 6 महीने से 2 साल तक की सजा और 20 हजार से 50 हजार रुपये तक जुर्माना हो सकता है।

लेकिन जमीन पर इस कानून का असर बहुत कम दिखाई देता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े भी इस स्थिति को उजागर करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश में बाल श्रम के मामलों में कार्रवाई बेहद कम हुई है।

वर्ष 2021 में केवल 5 मामले, 2022 में एक भी मामला नहीं और 2023 में सिर्फ 4 मामले दर्ज किए गए। यह आंकड़े बताते हैं कि समस्या मौजूद है, लेकिन कार्रवाई बहुत सीमित है।

वरिष्ठ पत्रकार ममताराम पाटुद के अनुसार निमाड़ क्षेत्र में बाल मजदूरी के पीछे कई कारण है। सबसे बड़ा कारण गरीबी है। जब परिवार की आय कम होती है, तो बच्चों को भी काम पर भेजा जाता है।

इसके अलावा गांवों में अच्छी शिक्षा की कमी भी एक बड़ी वजह है। कई जगह स्कूल तो हैं, लेकिन वहां सुविधाएं और पढ़ाई का स्तर कमजोर है। इससे बच्चों का मन पढ़ाई में नहीं लगता और वे काम की ओर बढ़ जाते हैं।

एक और कारण है सस्ता श्रम। कुछ किसान कम पैसे में ज्यादा काम करवाने के लिए बच्चों को काम पर रख लेते हैं। बच्चों से काम करवाना आसान होता है और उन्हें कम मजदूरी देनी पड़ती है। यह गलत है, लेकिन कई जगह यह आम बात बन चुकी है।

जिला श्रम अधिकारी कार्यालय की ओर से पिछले तीन साल में बाल मजदूरी कराने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई है।

जिला श्रम अधिकारी रविंद्र दुबे के अनुसार 14 वर्ष की कम उम्र के बच्चों से मजदूरी नहीं करवा सकते हैं। यदि ऐसा किया जाता है तो बाल श्रमिक (निषेध एवं नियंत्रण अधिनियम 1986) के तहत कार्रवाई का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाती है। लेकिन बाल मजदूरी जैसी समस्या में सिर्फ शिकायत का इंतजार करना पर्याप्त नहीं है।

जरूरत है कि अधिकारी खुद जाकर निरीक्षण करें और जहां भी बच्चे काम करते मिले, वहां तुरंत कार्रवाई करें। इस समस्या का समाधान आसान नहीं है, लेकिन संभव जरूर है।

सबसे पहले बच्चों को अच्छी और आसान शिक्षा उपलब्ध करानी होगी। स्कूलों की स्थिति सुधारनी होगी ताकि बच्चे वहां जाने के लिए प्रेरित हो। इसके साथ ही गरीब परिवारों को आर्थिक मदद और रोजगार के अवसर देने होंगे, ताकि वे बच्चों को मजदूरी के लिए न भेजें।

वरिष्ठ पत्रकार विवेक पाराशर के अनुसार समाज की भूमिका भी बहुत जरूरी है। अक्सर लोग बाल मजदूरी को देखकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन अगर लोग जागरूक हों और ऐसी घटनाओं की जानकारी दें, तो इस समस्या को कम किया जा सकता है।

मीडिया भी इस मुद्दे को सामने लाकर बड़ी भूमिका निभा सकता है। निमाड़ की जमीन देश के लिए अनाज पैदा करती है, लेकिन अगर उसी जमीन पर बच्चों का बचपन खत्म हो रहा है, तो यह चिंता की बात है।

विकास तभी सही मायनों में होगा, जब बच्चों को उनका हक मिलेगा। जब तक खेतों में काम करते बच्चों की जगह स्कूलों में पढ़ते बच्चे नजर नहीं आएंगे, तब तक समाज का विकास अधूरा ही माना जाएगा।

एडवोकेट मनीष विद्यार्थी के अनुसार बाल श्रम न केवल बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालता है, बल्कि यह उनकी गरिमा, समानता और न्याय के मूल्यों का भी हनन करता है। बचपन से मजदूरी करने के कारण बच्चों को वह समानता नहीं मिल पाती जो अन्य बच्चों को मिलती है।



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