भारत और अमेरिका के बीच घोषित अंतरिम व्यापार समझौते (India-US Trade Deal) को लेकर एक बार फिर नया विवाद सामने आ गया है। समझौते की घोषणा के कुछ ही दिनों बाद अमेरिका के White House द्वारा जारी फैक्ट शीट में यह खुलासा हुआ है कि भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों पर टैरिफ (आयात शुल्क) खत्म या कम करेगा, जिनमें “certain pulses” यानी कुछ दालें भी शामिल हैं। यह उल्लेख इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि 6 फरवरी को जारी भारत-अमेरिका के संयुक्त बयान में दालों का कोई स्पष्ट जिक्र नहीं था।
व्हाइट हाउस ने 9 फरवरी को जारी अपने दस्तावेज़ “The United States and India Announce Historic Trade Deal” में कहा है कि भारत सभी अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं और खाद्य-कृषि उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला पर टैरिफ खत्म या कम करेगा। इस सूची में ड्राय डिस्टिलर्स ग्रेन्स (DDGs), रेड ज्वार, ट्री नट्स, ताजे और प्रोसेस्ड फल, certain pulses, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स शामिल हैं।
यह बयान 6 फरवरी को जारी संयुक्त वक्तव्य से अलग है। उस संयुक्त बयान में अमेरिकी कृषि उत्पादों की सूची में दालों का नाम नहीं था। वहां केवल DDGs, पशु आहार के लिए रेड ज्वार, ट्री नट्स, फल, सोयाबीन तेल और शराब उत्पादों का उल्लेख किया गया था। ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि आखिर “कुछ दालें” इस समझौते में कब और कैसे शामिल हुईं।
यह संयुक्त बयान अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई बातचीत के बाद सामने आया था। दोनों नेताओं ने आपसी व्यापार को बढ़ाने और भविष्य में व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement – BTA) पर बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई थी।
इधर भारत में इस मुद्दे पर राजनीतिक और किसान संगठनों की चिंता बढ़ने लगी है, क्योंकि दालें देश की खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय का अहम हिस्सा हैं। भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है। यदि अमेरिका से दालों का आयात सस्ता हुआ, तो इसका सीधा असर घरेलू किसानों और बाजार कीमतों पर पड़ सकता है।
हालांकि इस पूरे विवाद के बीच केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सफाई दी है। 8 फरवरी को भोपाल में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में गेहूं, चावल, मक्का, बाजरा, आलू, प्याज, मटर, बीन्स, खीरा, मशरूम, दालें, जमी हुई सब्जियां, संतरा, अंगूर, नींबू, स्ट्रॉबेरी और डिब्बाबंद मिश्रित सब्जियां नहीं आएंगी। उनका कहना था कि सरकार किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं करेगी।
इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि व्हाइट हाउस की फैक्ट शीट और भारत सरकार के बयानों में फर्क अपने-आप में कई सवाल खड़े करता है। यदि दालें समझौते के दायरे में नहीं हैं, तो फिर अमेरिकी दस्तावेज़ में “certain pulses” का उल्लेख क्यों किया गया? और अगर कुछ विशेष दालें शामिल हैं, तो उनकी सूची और शर्तें क्या होंगी?
कृषि अर्थशास्त्रियों के अनुसार, इस तरह की अस्पष्टता बाजार में अनिश्चितता पैदा करती है। किसान पहले ही बढ़ती लागत, कम MSP और आयात के दबाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में India-US Trade Deal को लेकर साफ और पारदर्शी जानकारी देना सरकार के लिए बेहद जरूरी है।
फिलहाल यह साफ है कि दालों को लेकर उठा यह सवाल आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस और किसान आंदोलनों का बड़ा मुद्दा बन सकता है। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि सरकार इस विरोधाभास पर क्या आधिकारिक स्पष्टीकरण देती है और क्या भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की शर्तों में कोई बदलाव या स्पष्टता सामने आती है।















