डिजिटल फ्रॉड पीड़ितों को मुआवज़ा दे RBI या सरकार? नीति को लेकर उठे अहम सवाल


डिजिटल फ्रॉड के बढ़ते मामलों के बीच RBI द्वारा मुआवज़ा व्यवस्था पर चर्चा। क्या यह केंद्रीय बैंक की भूमिका है या सरकार को नीति बनानी चाहिए? पूरी रिपोर्ट पढ़ें।


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बड़ी बात Published On :

डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन बैंकिंग के दौर में साइबर ठगी की घटनाएँ तेजी से बढ़ी हैं। ऐसे में हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की ओर से डिजिटल फ्रॉड के शिकार उपभोक्ताओं को मुआवज़ा देने की संभावित व्यवस्था पर चर्चा ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सवाल यह है कि क्या केंद्रीय बैंक को ऐसे मामलों में सीधे हस्तक्षेप करना चाहिए, या फिर यह जिम्मेदारी सरकार की नीतिगत सीमा में ही रहनी चाहिए।

 

आमतौर पर RBI की मौद्रिक नीति घोषणाएँ रेपो रेट, तरलता प्रबंधन और बैंकिंग सिस्टम से जुड़े तकनीकी पहलुओं तक सीमित रहती हैं, जिनका असर आम लोगों तक परोक्ष रूप से पहुँचता है। लेकिन इस बार डिजिटल फ्रॉड से जुड़े उपभोक्ता संरक्षण के मुद्दे ने सीधे नागरिकों को प्रभावित किया है। प्रस्ताव यह संकेत देता है कि साइबर ठगी के मामलों में पीड़ितों को किसी प्रकार की क्षतिपूर्ति व्यवस्था मिल सकती है, जिससे आम खाताधारकों को राहत मिलने की उम्मीद है।

 

हालाँकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम डोमेन ओवरलैप यानी अधिकार क्षेत्र के टकराव की समस्या पैदा कर सकता है। केंद्रीय बैंक का मूल दायित्व मौद्रिक स्थिरता, बैंकिंग निगरानी और वित्तीय प्रणाली को सुरक्षित रखना है। यदि RBI मुआवज़ा नीति जैसे सामाजिक या प्रशासनिक मामलों में गहराई से उतरता है, तो यह “मिशन क्रीप” का उदाहरण बन सकता है—जहाँ एक संस्था अपने पारंपरिक दायरे से बाहर जाकर जिम्मेदारियाँ संभालने लगती है।

 

आलोचकों का तर्क है कि डिजिटल फ्रॉड से निपटने के लिए मजबूत कानून, पुलिस व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया की आवश्यकता होती है, जो कि मुख्य रूप से सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती है। यदि मुआवज़ा देना है, तो उसके लिए स्पष्ट कानून, बजट प्रावधान और जवाबदेही तंत्र होना चाहिए। RBI द्वारा ऐसी व्यवस्था बनाने से यह भ्रम पैदा हो सकता है कि हर वित्तीय नुकसान की भरपाई केंद्रीय बैंक करेगा, जिससे बैंकों और उपभोक्ताओं—दोनों की सतर्कता पर असर पड़ सकता है।

 

दूसरी ओर, उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि जब डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने में RBI और सरकार दोनों की भूमिका रही है, तो सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है। साइबर ठगी के मामलों में आम लोग अक्सर बैंक, पुलिस और अन्य एजेंसियों के बीच फँस जाते हैं। ऐसे में एक स्पष्ट और समयबद्ध मुआवज़ा प्रणाली भरोसा बढ़ा सकती है।

 

इसी बीच, आर्थिक मोर्चे पर एक और अहम संकेत मिला है। विदेशी निवेशकों की भारतीय शेयर बाजार में वापसी देखी जा रही है। फरवरी की शुरुआत में ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने हजारों करोड़ रुपये के शेयर खरीदे हैं। विश्लेषकों के अनुसार, इस बदले हुए रुझान के पीछे India-US trade deal को लेकर बनी सकारात्मक धारणा भी एक कारण है। लंबे समय से बिकवाली के बाद यह निवेश बाजार में राहत का संकेत माना जा रहा है।

 

हालाँकि, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि केवल विदेशी निवेश की वापसी से स्थायी तेजी नहीं आएगी। इसके लिए कॉरपोरेट आय में मजबूत वृद्धि, घरेलू निवेश और नीतिगत स्थिरता भी जरूरी है। यदि ये सभी कारक एक साथ काम करते हैं, तभी बाजार और अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक मजबूती मिल सकती है।

 

कुल मिलाकर, डिजिटल फ्रॉड पर मुआवज़े का प्रस्ताव और विदेशी निवेश की वापसी—दोनों ही मुद्दे यह दिखाते हैं कि आर्थिक नीतियों में संतुलन कितना महत्वपूर्ण है। एक ओर उपभोक्ता संरक्षण की जरूरत है, तो दूसरी ओर संस्थानों की सीमाओं और जिम्मेदारियों को स्पष्ट रखना भी उतना ही आवश्यक है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि RBI और सरकार मिलकर इस दिशा में क्या ठोस और व्यावहारिक समाधान निकालते हैं।

 

साभार: मिंट



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