करीब एक दशक बाद ऐसा संयोग बना जब बसंत पंचमी और जुमे की नमाज़ एक ही दिन पड़ी। इस संयोग ने मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया। कड़े सुरक्षा इंतजामों, भारी पुलिस बल और प्रशासन की सतर्क निगरानी के बीच शुक्रवार को यहां सरस्वती पूजा और नमाज़ दोनों शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराई गईं।
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए थे कि बसंत पंचमी के अवसर पर भोजशाला परिसर में दोनों समुदायों को एक साथ पूजा-पाठ और नमाज़ की अनुमति दी जाए। इसके बाद जिला प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था को अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ा दिया। भोजशाला, जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है और जिसे भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर भी कहा जाता है, वहां पूरे दिन विशेष सतर्कता बरती गई।
सुबह से ही बदला शहर का माहौल
शुक्रवार सुबह से ही धार शहर के हालात बदले-बदले नजर आए। संकरी गलियों से लेकर मुख्य सड़कों तक, हर जगह पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती थी। ड्रोन कैमरों से भीड़ पर नजर रखी जा रही थी और एक केंद्रीय कंट्रोल रूम से पूरे शहर की निगरानी की जा रही थी। लगभग आठ हजार से अधिक पुलिसकर्मी, रैपिड एक्शन फोर्स की टुकड़ियां और महिला पुलिस बल तैनात किए गए थे।

बसंत पंचमी के अवसर पर हजारों हिंदू श्रद्धालु जुलूस के रूप में भोजशाला की ओर बढ़े। केसरिया झंडों, भक्ति गीतों और “चलो भोजशाला” के नारों से पूरा इलाका गूंज उठा। महिलाएं पीले और केसरिया वस्त्रों में, बच्चे हाथों में ध्वज लिए नजर आए। वहीं दूसरी ओर, सीमित संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोगों को तय समय और तय स्थान पर नमाज़ अदा कराने के लिए परिसर के भीतर ले जाया गया। उन्हें अलग मार्ग से प्रवेश दिया गया और सुरक्षा बल पूरी तरह मुस्तैद रहे।
विवाद का पुराना इतिहास
भोजशाला को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। 11वीं शताब्दी के इस स्मारक को लेकर वर्षों से हिंदू और मुस्लिम संगठनों के बीच मतभेद रहे हैं। हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम समुदाय यहां जुमे की नमाज़ अदा करता आया है। 2003 में एएसआई ने एक व्यवस्था बनाई थी, जिसके तहत मंगलवार को पूजा और शुक्रवार को नमाज़ की अनुमति थी। हालांकि बाद में इस व्यवस्था को लेकर अदालतों में याचिकाएं दाखिल होती रहीं।
2022 में एक जनहित याचिका के जरिए इस व्यवस्था को चुनौती दी गई और 2024 में हाईकोर्ट के निर्देश पर एएसआई सर्वे भी हुआ, जिसमें कहा गया कि मौजूदा ढांचा पुराने मंदिरों के अवशेषों से बना हो सकता है। इसी पृष्ठभूमि में बसंत पंचमी और जुमे की नमाज़ का एक साथ आयोजन बेहद संवेदनशील माना जा रहा था।
प्रशासन का दावा – पूरी तरह शांत रहा माहौल
हालांकि दिन के अंत में प्रशासन ने राहत की सांस ली। जिला प्रशासन के अनुसार, दोनों समुदायों ने अदालत के आदेशों का पालन किया और कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। कुछ लोगों ने व्यवस्थाओं को लेकर सवाल जरूर उठाए, लेकिन कुल मिलाकर माहौल नियंत्रित और शांत बना रहा।
भोजशाला का यह दिन एक बार फिर यह दिखाता है कि आस्था, इतिहास और राजनीति के संगम पर खड़े ऐसे स्थल केवल स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व के विषय बन चुके हैं। आने वाले समय में अदालतों और सरकार के फैसले इस विवाद की दिशा तय करेंगे, लेकिन फिलहाल धार ने कड़ी सुरक्षा के साये में एक संवेदनशील दिन शांति से पार कर लिया।

















