अमित शाह ने सोमवार को संसद में एक बड़ा दावा करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र से माओवाद लगभग समाप्त हो चुका है और अब यह इलाका विकास की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र सरकार द्वारा तय की गई 31 मार्च 2026 की डेडलाइन अब बेहद करीब है, जिसके तहत देश को नक्सलवाद से मुक्त करने का लक्ष्य रखा गया था।
डेडलाइन से पहले बड़ा दावा
अप्रैल 2025 में अमित शाह ने स्पष्ट घोषणा की थी कि केंद्र सरकार देश को नक्सलवाद से मुक्त करने के लिए संकल्पबद्ध है और इसके लिए 31 मार्च 2026 तक का समय निर्धारित किया गया है। उन्होंने माओवादियों से अपील भी की थी कि वे हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में शामिल हों।
अब, इसी समयसीमा के खत्म होने से ठीक पहले संसद में दिया गया उनका बयान इस मिशन की सफलता का संकेत माना जा रहा है।
आंकड़े क्या कहते हैं?
सरकार के अनुसार, बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और विकास योजनाओं के चलते नक्सल गतिविधियों में भारी गिरावट आई है।
2025 के प्रमुख आंकड़े:
- 256 नक्सली मुठभेड़ों में ढेर
- 1,500 से अधिक माओवादियों का आत्मसमर्पण
- मई 2025 में अबूझमाड़ में मुठभेड़ के दौरान नंबाला केशव राव की मौत, जिन पर ₹3.5 करोड़ का इनाम था
राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति:
कभी 180 जिलों में फैला “रेड कॉरिडोर” अब सिमटकर लगभग 12 जिलों तक रह गया
2015 से 2025 के बीच 10,000 से अधिक नक्सलियों ने हथियार डाले
हाल के वर्षों में नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन तेज हुए हैं, जिससे उनकी क्षमता कमजोर हुई है
जमीनी हकीकत: चुनौतियां अभी बाकी
हालांकि सरकार के आंकड़े सफलता की कहानी बताते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
जनवरी 2025 में बीजापुर में IED विस्फोट में 8 DRG जवान और एक नागरिक चालक की मौत हुई। यह घटना बताती है कि नक्सली अभी भी घातक हमले करने में सक्षम हैं। वहीं, मार्च 2025 में बस्तर में एक राजनीतिक कार्यकर्ता की हत्या भी हुई।
इन घटनाओं से स्पष्ट है कि “लगभग खत्म” और “पूरी तरह खत्म” के बीच का अंतर अभी बना हुआ है।
विकास बनाम विस्थापन का सवाल
बस्तर में सड़क, मोबाइल नेटवर्क, स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा जैसी सुविधाओं का विस्तार हुआ है। पहले जो इलाके पूरी तरह कटे हुए थे, वहां अब सरकारी पहुंच बनी है।
लेकिन इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है—क्या यह विकास स्थानीय आदिवासी समुदायों के हित में है?
आदिवासी संगठनों का आरोप है कि जिन क्षेत्रों से माओवादियों को हटाया जाता है, वहां खनन और औद्योगिक परियोजनाएं तेजी से शुरू होती हैं, जिससे स्थानीय लोगों के विस्थापन का खतरा बढ़ता है।
ऐतिहासिक संदर्भ
भारत में नक्सलवाद की शुरुआत नक्सलबाड़ी से 1967 में हुई थी। इसे देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती बताते हुए मनमोहन सिंह ने 2011 में गंभीर चिंता जताई थी।
पिछले कई दशकों में इस संघर्ष में 12,000 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें आम नागरिक, सुरक्षाकर्मी और माओवादी शामिल हैं।
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