नरवाई जलाने की मजबूरी: महंगाई और नुकसान के बीच जूझते किसान, खेतों की सेहत पर गहरा असर


धार जिले में बढ़ती महंगाई और खेती की लागत के कारण किसान नरवाई जलाने को मजबूर हैं। हालांकि यह प्रतिबंधित है, लेकिन इससे खेतों की उर्वरता घट रही है और प्रदूषण बढ़ रहा है, जिससे पर्यावरण और किसानों दोनों को नुकसान हो रहा है।


आशीष यादव आशीष यादव
उनकी बात Published On :

मध्यप्रदेश के धार जिले में इन दिनों खेतों में नरवाई जलाने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। सरकार द्वारा इस पर प्रतिबंध होने के बावजूद किसान मजबूरी में यह कदम उठा रहे हैं। बढ़ती महंगाई, महंगे डीजल और कृषि संसाधनों की लागत ने किसानों की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर दिया है। ऐसे में किसान सस्ती और त्वरित उपाय के रूप में नरवाई जलाने को मजबूर हैं, लेकिन इसका खामियाजा उन्हें अपनी ही जमीन की उर्वरता खोकर चुकाना पड़ रहा है।

महंगाई बनी सबसे बड़ी वजह

किसानों का कहना है कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि फसल का उचित दाम नहीं मिल पा रहा। डीजल, मजदूरी और कृषि यंत्रों के खर्च ने किसानों की कमर तोड़ दी है। यदि किसान नरवाई को खेत में मिलाकर उपयोग करना चाहते हैं तो इसके लिए अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है, जो हर किसान के लिए संभव नहीं है। यही कारण है कि वे मजबूरी में नरवाई जलाने का रास्ता अपनाते हैं।

 

नरवाई जलाने से खेतों को भारी नुकसान

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार नरवाई में नाइट्रोजन (0.5%), फास्फोरस (0.6%) और पोटाश (0.8%) जैसे जरूरी पोषक तत्व होते हैं, जो जलने से पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। एक हेक्टेयर खेत में यह नुकसान हजारों रुपये के बराबर होता है। इतना ही नहीं, खेतों में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव, केंचुए और जैविक तत्व भी आग में जलकर खत्म हो जाते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है और उत्पादन क्षमता पर सीधा असर पड़ता है।

 

प्रदूषण और हादसों का खतरा

नरवाई जलाने से निकलने वाला धुआं न सिर्फ वायु प्रदूषण बढ़ाता है बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी असर डालता है। आंखों में जलन, सांस की बीमारियां और त्वचा रोग जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। कई बार यह आग दूसरे खेतों और घरों तक पहुंच जाती है, जिससे जन-धन हानि की आशंका बनी रहती है। हाल ही में कई मामलों में लाखों रुपये की फसल जलकर खाक हो चुकी है।

 

प्रशासन और जागरूकता की कमी

हालांकि कृषि विभाग द्वारा नरवाई न जलाने के लिए लगातार समझाइश दी जाती है, लेकिन यह प्रयास अक्सर कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं। किसानों का आरोप है कि सरकार केवल नियम बनाती है, लेकिन उनके लिए कोई ठोस सहायता योजना नहीं लाती। किसानों का यह भी कहना है कि बड़ी कंपनियों के कर्ज माफ होते हैं, लेकिन किसानों के लिए राहत योजनाएं नहीं बनतीं।

किसानों के लिए विकल्प मौजूद

विशेषज्ञों का कहना है कि किसान स्ट्रॉ रीपर, रोटावेटर या कल्टीवेटर जैसे यंत्रों का उपयोग कर नरवाई को खाद में बदल सकते हैं। इसके अलावा वर्मी कम्पोस्ट और जैविक खाद बनाकर खेत की उर्वरता बढ़ाई जा सकती है। इससे न सिर्फ लागत घटेगी बल्कि उत्पादन भी बेहतर होगा।

किसानों की पीड़ा और सवाल

ग्रामीण किसानों का कहना है कि नियम सिर्फ उनके लिए ही बनाए जाते हैं। जब उनकी फसल जलती है तो मुआवजे के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता है। वहीं अन्य कारणों से लगने वाली आग पर उतनी सख्ती नहीं दिखाई जाती। किसानों ने सरकार से मांग की है कि नरवाई न जलाने के लिए उन्हें आर्थिक सहायता और मशीनों पर सब्सिडी दी जाए।

नरवाई जलाना एक गंभीर समस्या बन चुकी है, जो किसानों की मजबूरी और व्यवस्था की खामियों दोनों को उजागर करती है। यदि समय रहते इस पर ठोस कदम नहीं उठाए गए तो न केवल खेती की गुणवत्ता प्रभावित होगी, बल्कि पर्यावरण और स्वास्थ्य पर भी इसका दीर्घकालिक असर पड़ेगा। सरकार, प्रशासन और किसानों को मिलकर इस समस्या का समाधान निकालना होगा, तभी खेती और पर्यावरण दोनों सुरक्षित रह पाएंगे।



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