प्रयागराज में ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य और उत्तर प्रदेश प्रशासन व मुख्यमंत्री के बीच उपजे विवाद ने अब राष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक और राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच कई केंद्रीय मंत्रियों और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती से संपर्क कर उनसे हस्तक्षेप की अपील की, ताकि मामला शांत हो सके। हालांकि द्वारका शंकराचार्य ने इस आग्रह को साफ शब्दों में अस्वीकार कर दिया है और इसे धर्म व पीठ के सम्मान से जुड़ा गंभीर विषय बताया है।
स्पष्ट ‘ना’ और कड़ा संदेश
द्वारका शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा कि यह कोई साधारण प्रशासनिक विवाद नहीं, बल्कि धर्म और शंकराचार्य पीठ की मर्यादा से जुड़ा मामला है। उन्होंने दो टूक कहा कि वह इस प्रकरण में मध्यस्थता नहीं करेंगे। उनके अनुसार, यदि प्रशासन अपनी गलती स्वीकार कर माफी मांग ले, तो तनातनी वहीं समाप्त हो सकती है, लेकिन बिना आत्मालोचना के हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं है।
संत समाज में बढ़ता विभाजन
प्रयागराज की घटना के बाद संत समाज के भीतर बढ़ते मतभेदों को लेकर पूछे गए सवाल पर द्वारका शंकराचार्य ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि सत्ता के दबाव और सत्ता के प्रसाद की लालसा में कुछ संत-महात्मा धर्म को पीछे रखकर स्वयं को सुर्खियों में बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे लोगों के लिए “सत” अर्थात ईश्वर प्रथम नहीं, बल्कि निजी स्वार्थ सर्वोपरि है। यही कारण है कि संत समाज में दो धड़े बनते जा रहे हैं और आरोप-प्रत्यारोप से वातावरण और अधिक विषाक्त हो रहा है।
भाजपा नेताओं से संपर्क की पुष्टि
जब उनसे यह पूछा गया कि क्या केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं—जो उनके शिष्य भी बताए जाते हैं—ने प्रयागराज प्रकरण में हस्तक्षेप के लिए उनसे संपर्क किया, तो उन्होंने इसकी पुष्टि की। उन्होंने कहा कि कई संदेश और सूचनाएं आईं, अनेक लोगों ने व्यक्तिगत रूप से आग्रह किया, लेकिन उन्होंने सभी को स्पष्ट मना कर दिया। उनके शब्दों में, “यह धर्म के अपमान का मामला है, इसमें किसी प्रकार की राजनीतिक सुलह की भूमिका नहीं निभाई जा सकती।”
पुरी पीठ को लेकर स्थिति स्पष्ट
इस बातचीत में शंकराचार्य परंपरा से जुड़े एक अन्य विवाद पर भी उन्होंने अपनी बात खुलकर रखी। उन्होंने कहा कि पुरी पीठ के असली और मान्य शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ही हैं। उनके अनुसार, अधोक्षानंद नामक व्यक्ति को पुरी के शंकराचार्य के रूप में प्रचारित किया जाना भ्रम फैलाने वाला है और इसके पीछे भी सत्ताधीशों की भूमिका रही है।
विद्वत्ता और परंपरा का हवाला
द्वारका के शंकराचार्य ने कहा कि स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी ने हमारे गुरु ब्रह्मलीन शंकराचार्य जी और श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य के साथ चतुष्पीठ सम्मेलन, राम जन्म भूमि, रामसेतु जैसे राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर सक्रिय भूमिका निभाई। वे वेद, पुराण और शास्त्रों के गहरे ज्ञाता और उद्भट विद्वान हैं।
प्रयागराज प्रकरण ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि जब धर्म, परंपरा और सत्ता आमने-सामने आते हैं, तो विवाद केवल प्रशासनिक नहीं रह जाता। द्वारका शंकराचार्य का सख्त रुख यह संकेत देता है कि शंकराचार्य परंपरा अपने सम्मान और स्वायत्तता से किसी भी प्रकार का समझौता करने को तैयार नहीं है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व इस संदेश को किस तरह ग्रहण करता है।

















